हमारे शरीर की मुख्य तीन प्रकृति। वात, पित्त और कफ। यह प्रकृति जन्म के साथ आकार लेती है। संतुलन में रहने पर शरीर स्वस्थ रहता है और इस संतुलन में गड़बड़ी होने पर शरीर रोगिष्ट होता है। उदाहरण के लिए, जब पित्त प्रकृति के व्यक्ति के अंदर पित्त की मात्रा बढ़ जाए, तो शरीर में अम्लता, मुंह के छाले, मगज अशांत रहना, बालों का सफेद होना, कब्ज़, अपच, एसिडिटी आदि समस्याएं होती हैं।
पित्त बढ़ जाने के लक्षण
– बहुत अधिक थकावट, नींद में कमी
– शरीर में तेज जलन, गर्मी लगना और ज्यादा पसीना आना
– त्वचा का रंग पहले की तुलना में गाढ़ा हो जाना
– अंगों से दुर्गंध आना
– मुंह, गला आदि का पकना
– ज्यादा गुस्सा आना
– बेहोशी और चक्कर आना
– मुंह का कड़वा और खट्टा स्वाद
– ठंडी चीजें ज्यादा खाने का मन करना
वात बढ़ जाने के लक्षण
– अंगों में रूखापन और जकड़न
– हड्डियों के जोड़ों में ढीलापन
– हड्डियों का खिसकना और टूटना
– अंगों में कमजोरी महसूस होना एवं अंगों में कंपकपी
– अंगों का ठंडा और सुन्न होना
– कब्ज़
– नाख़ून, दांतों और त्वचा का फीका पड़ना
– मुंह का स्वाद कडवा होना
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